IGNOU ECONOMICS Question PDF BECC132 BA Notes in Hindi

IGNOU ECONOMICS Question

BA IGNOU Economics Question (BECC132) Notes in Hindi with PDF Download for 2021-22 session students. Most important study material for 1st year exam paper and assignments preparation. These Questions for BAG (Bachelor of Arts General) students, who is doing graduation through ODL (Open distance learning) mode. IGNOU Mean Indira Gandhi National Open University.

Course Code: BECC132

Name of Course: Principles of Micro Economics- (ii)

IGNOU ECONOMICS Question

1. एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार के अभिलक्षण की संक्षिप्त विवेचना कीजिये |

उत्तर – एक पूर्ण प्रतियोगी बाजार में निम्नलिखित अभिलक्षण पाए जाते है :

i) उद्योग विखंडित होता है जिसमे बड़ी संख्या में क्रेता और विक्रेता होते है | प्रत्येक क्रेता द्वारा किया गया क्र्यांश इतना छोटा होता है की वह बाजार कीमत को प्रभावित नहीं कर पाता | बाजार की मांग की तुलना में प्रत्येक विक्रेता का विक्रय अंश भी इतना छोटा होता है की वह बाजार की कीमत पर मामूली-सा भी प्रभाव नहीं डाल पाता | इतना ही नहीं प्रत्येक विक्रेता के आगत क्रय भी इतने कम होते है की वे आगत कीमतों को प्रभावित नहीं कर पाते

ii) फर्म समरूप (सजातीय) उत्पादों का उत्पादन करती है | इसका अर्थ यह हुआ की उपभोक्ता सभी इकाइयों को एक जैसी ही समझता है, भले ही उनका उत्पादन किसी भी फर्म द्वारा क्यों न किया गया हो | किसी फर्म ‘अ’ द्वारा उत्पादित उत्पाद किसी भी रूप में ‘ब’ फर्म द्वारा उत्पादित उत्पाद से भिन्न नहीं होता | इसी से कीमत प्रतिस्पर्धा उत्पन्न होती है |

iii) फर्मों एवं उपभोक्ताओं, दोनों को ही पूर्ण जांनकारी/सुचना होती है | फर्म को प्रोद्योगिकी एवं विनिर्माण प्रक्रिया में सुधार की पूरी जानकारी होती है जबकि उपभोक्ताओं को फर्म की कीमतों की जानकारी होती है |

iv) उद्योग की सभी इकाइयों की संसाधनों तक समान पहुच होती है उद्योग की विद्यमान फर्मों एवं प्रवेश करने वाली सम्भावित फर्मों की एक सामान प्रोद्योगिकी एवं आगतों तक पहुच होती है | फर्में अपनी आवश्यकतानुसार आगतों, जैसे की श्रम पूंजी एवं सामान को जुटा सकती है तथा उनकी आवश्यकता न रहने पर उन्हें रोजगार से हटा भी सकती है |

v) पूर्ण प्रतियोगी बाजार में फर्मों के प्रवेश में किसी प्रकार की बाधा नहीं होती | विद्यमान फर्मों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए बाजार में प्रवेश करने से फर्मों को कोई रोक नहीं सकता | एसी बाधाओं में शामिल हो सकती है: उच्च प्रारंभिक लागतें प्रमुख प्रोद्योगिकी एवं कच्चे माल तक पहुँच का अभाव, तथा वांछित पेटेंट अधिकार प्राप्त न होना जैसे विविध बाधाएं आदि |

2) क्या वास्तविक जगत में पूर्ण प्रतियोगी जैसे बाजार की कल्पना की जा सकती है यदि हाँ तो समानताओं के आधार पर उनको सूचीबद्ध कीजिये |

उत्तर – वास्तविक जगत में ऐसे उद्योग का उदाहरण देना अत्यधिक कठिन है जो ‘पूर्ण ज्ञान’ एवं ‘पूर्ण सुचना’ की सभी कसौटियों  पर खरा उतरता हो | तथापि, कुछ उद्योग पूर्णत: प्रतियोगी बाजार के निकटस्थ अवश्य है |

i) विदेशी विनिमय बाजार : चूंकि मुद्रा (करेंसी) समरूप/सजातीय होती है तथा कारोबारी अनेक क्रेताओं तक एक समान एवं निर्बाध पहुँच रखते है, क्रेताओं एवं विक्रेताओं के पास करेंसी को किसी से भी खरीदने-बेचने का विकल्प होता है | करेंसी की सापेक्ष कीमत की जानकारी क्रेताओं के पास रहती है इसलिए वे करेंसी क्रय करते समय विद्यमान कीमतों के बिच तुलना कर सकते है |

ii) कृषि बाजार : सामान्यतया, अनेक कृषक बाजार में एक जैसा उत्पाद ही बेच रहे होते है जहाँ क्रेताओं की संख्या भी बहूत अधिक होती है | बाजार में कीमतों की तुलना करना भी आसान होता है | इसलिए कृषि बाजार भी पूर्ण प्रतियोगी बाजार के निकटस्थ पाए जाते है |

iii) इन्टरनेट आधारित बाजार: इन्टरनेट ने अनेक बाजारों को पूर्ण प्रतियोगी बाजार के निकटस्थ बना दिया है क्योंकि इन्टरनेट पर कीमतों की तुलना शीघ्रता एवं दक्षता से कर पाना आसान हो गया है | इन्टरनेट के मध्यम से बाजार में प्रवेश अब अपेक्षाकृत अधिक आसान हो गया है | उदाहरनार्थ, अमेज़न या इ-कार्ट या फ्लिपकार्ट जैसे सेवाओं के माध्यम से इन्टरनेट पर बिक्री किया जाना, पूर्ण प्रतियोगी बाजार के साद्रश्य है | बाजार तक समान पहुंच तथा उत्पादों और कीमतों के बारे में पूर्ण जानकारी की उपलब्धता से वस्तुओं की कीमतें बाजार कीमत के अनुरूप कम होना प्रारंभ हो जाती है और दीर्घकाल में एसी फर्में सामान्य लाभ को प्राप्त करती है |

3) निम्न कथनों में सत्य/असत्य बताइए –

i) एक पूर्ण प्रतियोगी फर्म उस बिंदु पर उत्पादन करेगी जहाँ कीमत औसत परिवर्तनशील लागत के बराबर होती है |

उत्तर – असत्य

ii) फर्म के बंद होने का बिंदु वह होता है जहाँ कीमत न्यूनतम औसत लागत से कम होती है |

उत्तर – असत्य

iii) एक फर्म का आपूर्ति वक्र केवल उसकी सीमांत लागत पर निर्भर करता है | आपूर्ति निर्णय हेतु लागत की अन्य सभी अवधारणाएं निरर्थक है

उत्तर – असत्य

iv) पूर्ण प्रतियोगी फर्म कीमत सीमांत लागत के बराबर तय करती है |

उत्तर – असत्य

4. यदि कीमत औसत परिवर्तनशील लागत के न्यूनतम स्तर से भी नीची हो तो क्या पूर्ण प्रतियोगी फर्म उत्पादन जारी रखेगी

उत्तर – नहीं

5. कीमत विभेद क्या है?

उत्तर- एकाधिकार में वस्तु का केवल एक ही विक्रेता होता है जिसे एकाधिकारी कहते है | एकाधिकारी का वस्तु की कीमत निर्धारण, मांग व पूर्ति से जुड़े निर्णयों पर नियंत्रण होता है जिसके चलते एकाधिकारी एसी कीमत निर्धारित करने में सफल हो जाता है की वह अपने लाभ को अधिकतम कर सके |

एकाधिकारी प्राय: विभिन्न उपभोक्ताओं से एक ही वस्तु की अलग-अलग कीमत वसूलने में भी सफल हो जाता है | इसे ही कीमत विभेद कहा जाता है |

6. कीमत विभेद के स्तरों की व्याख्या कीजिये?

उत्तर – कीमत विभेद के स्तर –

i) प्रथम स्तरीय कीमत विभेद –  ऐसा कीमत विभेद जहाँ एकाधिकारी एसी अधिकतम कीमत निर्धारित करता है जिसका भुगतान करने के लिए बस एक क्रेता तैयार या इच्छुक हो | इसे पूर्ण कीमत विभेद भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें उपभोक्ताओं का अधिकतम शोषण होता है | इसमें उपभोक्ता किसी भी प्रकार की उपभोक्ता बचत प्राप्त कर पाने में असफल रहता है | इस प्रकार की कीमत विभेद प्राय: वकीलों एवं चिकित्सको द्वारा अपनाया जाता है |

ii) द्वितीय स्तरीय कीमत विभेद – ऐसा कीमत विभेद उस अवस्था में उत्पन्न होता है जब क्रेताओं को विभिन्न समूहों में बाँट कर प्रत्येक समूह के क्रेताओं के लिए एक ही वस्तु अथवा सेवा की एसी कीमत निर्धारित की जाती है जिसका भुगतान करने के लिए उस समूह के क्रेता तैयार या इच्छुक है | रेलवे तथा एयरलाइन्स इस प्रकार का कीमत विभेद अपनाती है |

iii) तृतीय स्तरीय कीमत विभेद – इस प्रकार के कीमत विभेद में एकाधिकारी सम्पूर्ण बाजार को उप या सह-बाजारों में बाँट देता है और प्रत्येक सह-बाजार में अलग-अलग कीमत वसूली जाती है | इस प्रकार के कीमत विभेद को बाजार खंडिकरण कहा जाता है |

7. एकाधिकार के अंतर्गत कीमत निर्धारण किस प्रकार पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत निर्धारण से भिन्न है |

उत्तर – निम्नलिखित बिंदु एकाधिकार एवं पूर्ण प्रतियोगिता के बिच अंतर को स्पष्ट करते है |

i) उत्पादन एवं कीमत : पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत कीमत औसत लागत के बराबर होती है जो की संतुलन उत्पादन स्तर पर सीमांत लागत के बराबर है | किन्तु एकाधिकार के अंतर्गत, कीमत सदैव सीमांत लागत से अधिक होती है, यह औसत लागत के बराबर, कम या अधिक हो सकती है |

ii) प्रवेश : पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत उद्योग में फर्मो के प्रवेश या बाहर निकालने में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं होती लेकिन सरल एकाधिकार में फर्म के प्रवेश करने या बाहर निकालने में कठोर बाधाएं होती है |

iii) कीमत विभेद : एकाधिकार के अंतर्गत एकाधिकारी क्रेताओं के अलग-अलग समूहों से अलग-अलग कीमत ले सकता है लेकिन पूर्ण प्रतियोगिता में ऐसा संभव नहीं है |

iv) लाभ : दीर्घकाल में कीमत एवं औसत लागत के बिच का अंतर एकाधिकार के अंतर्गत असामान्य लाभ के रूप में परिलक्षित होता है जबकि पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत दीर्घकाल में फर्म को सामान्य लाभ ही प्राप्त होता है |

v) फर्म का आपूर्ति वक्र : पूर्ण प्रतियोगिता के अंतर्गत आपूर्ति वक्र ज्ञात हो सकता है क्योंकि कोई भी फर्म उद्योग में निर्धारित कीमत पर मनचाही मात्रा में उत्पाद बेच सकता है | इतना ही नही, पूर्ण प्रतियोगिता में कीमत विभेद भी नहीं होता | जबकि एकाधिकार में आपूर्ति वक्र ज्ञात नहीं होता |

8) सार्वजानिक एकाधिकार किस प्रकार निजी एकाधिकार फर्म से भिन्न है ?

उत्तर – सार्वजानिक एकाधिकारी का उद्देश्य अधिक उत्पादन करना एवं उसके लिए नीची कीमत रखना है ताकि जन कल्याण को बढाया जा सके | ऐसे उपक्रम का अनुकूलतम कीमत एवं उत्पादन निर्धारण लाभ या बिक्री को अधिकतम करने के सिद्धांत पर आधारित नहीं है बल्कि लोक-कल्याण पर आधारित है | लेकिन निजी एकाधिकार फर्म केवल अपने लाभ को बढ़ाने के उद्देश्य से उत्पादन करती है | एकाधिकारी को विनियमित किये जाने की भी आवश्यकता है क्योंकि एकाधिकारी उत्पाद की आपूर्ति को नियंत्रित करके कीमत बढाकर असामान्य लाभ अर्जित करने की क्षमता रखता है | ऐसे व्यवहार से समाज में आय एवं धन के वितरण की असमानताएं बढती है, जो उपभोक्ताओं के शोषण के रूप में परिलक्षित होती है | इनका निबल परिणाम समाज में उपभोक्ता कल्याण में ह्रास के रूप में होता है |

9) एकाधिकारी प्रतियोगीता क्या है? कुछ उदाहरणों से समझाइए |

उत्तर – एकाधिकारी प्रतियोगिता एक ऐसा बाजार है जहाँ कोई फर्म आसानी से प्रवेश करके अपना ब्रांड या एक विभेदीकृत उत्पाद बेच सकती है |

एकाधिकारिक प्रतियोगिता के उदाहरण

i) जब आप किसी डिपार्टमेंटल स्टोर में एक टूथपेस्ट खरीदने के लिए जाते है तो आपको पेप्सोडेंट, कोलगेट, दन्तकान्ति, नीम, बबूल जैसे अनेक ब्रांड दिखाई देते है | एक और जहाँ टूथपेस्ट के बाजार में सैंकड़ों ब्रांडो के बिच प्रवेश करने तथा प्रतियोगिता करने की छूट है, वही दूसरी और किसी एक ब्रांड की विशिष्टता के कारण उसे एक सीमा तक एकाधिकारी शक्ति भी प्राप्त है जिसके तहत उस ब्रांड की अलग कीमत वसूली जा सकती है | टूथपेस्ट के लिए ऐसा बाजार एकाधिकारी प्रतियोगिता वाला बाजार है |

ii) एक फर्म बाजार में लक्स नामक ब्रांड के साबुन की आपूर्ति करती है | बाजार में ऐसे अनेक फर्में है, जो इसी प्रकार के अन्य साबुन (बिलकुल ऐसा ही नहीं) बेचती है | जैसे की रेक्शोना, लिरिल आदि | कभी-कभी ऐसा भी होता है की एक ही कंपनी एक ही प्रकार की वस्तु अलग-अलग ब्रांड नामों से अलग-अलग कीमत पर उत्पादित करती है और बेचती है | इसके पीछे उत्पादकों/फर्मों का विचार ग्राहकों के बिच ब्रांड विशेष की एसी पहचान बनाना है जो लगभग स्थाई हो और उन्हें वही ब्रांड बार-बार खरीदने के लिए प्रेरित करे | लक्स साबुन की आपूर्ति करने वाली फर्म अपने इस उत्पाद के कारण एकाधिकार शक्ति बाजार में अन्य ब्रांडो के उत्पादकों से प्रतियोगिता भी करती है |

इसी प्रकार अनेक उत्पादों जैसे की प्लाईवुड निर्माता, आभूषण निर्माता, लड़की के फर्नीचर निर्माता, बुक स्टोरों, डिपार्टमेंटल स्टोरों सभी प्रकार की मरम्मत की सेवाएँ प्रदान करने वाली दुकानों, डॉक्टरों, तकनिशियनो, वकीलों जैसे पेशेवरों को इसी प्रकार की कुछ एकाधिकारिक शक्तियां प्राप्त होती है | इस प्रकार की एकाधिकारी शक्तियां प्राप्त बाजार की अन्य एसी ही फर्मो से युक्त बाजार को एकाधिकार प्रतियोगिता वाला बाजार कहा जाता है |

10. उन लक्षणों को चिन्हित कीजिये जो बाजार में एकाधिकारी प्रतियोगिता की मौजूदगी को दर्शाते है |

उत्तर –  एकाधिकारिक प्रियोगिता के लक्षण/विशेषताएं निम्नलिखित है –

i) विक्रेताओं की बड़ी संख्या : विभेदीकृत वस्तुओंका उत्पादन करने वाले विक्रेताओं की संख्या बड़ी होती है | इसलिए उनके बिच कड़ी प्रतियोगिता होती है | चूंकि बिक्रेताओं की संख्या अधिक होती है इसलिए बाजार की कुल आपूर्ति में कोई एक विक्रेता एक छोटा-सा ही भाग उत्पादित करता है | विक्रेता अपने उत्पाद की कीमत पर पूर्ण नियंत्रण बनाये रखने की स्थिति में होता है और प्रत्येक आकर में सिमित भी होता है | दुसरे शब्दों में, बड़ी संख्या में फर्में, पारस्परिक रूप से सम्बंधित उत्पाद, जो की समरूप नहीं होता, बेचती है | प्रत्येक फर्म बाजार के एक छोटे से हिस्से के साथ स्वतंत्र रूप से कार्य करती है इसलिए किसी व्यक्तिगत फर्म का बाजारी कीमत पर सीमांत नियंत्रण ही होता है | बाजारों में फर्मों की संख्या अधिक होने से प्रतियोगिता की स्थिति रहती है |

ii) उत्पाद विभेद : उत्पाद विभेद एकाधिकारिक प्रतियोगिता के अति महत्वपूर्ण विशेषता है | पूर्ण प्रतियोगिता में प्रत्येक फर्म द्द्वारा उत्पादित वस्तु एक जैसी होती है | एकाधिकारिक प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रत्येक फर्म अपने उत्पाद को अन्य उत्पादों की भांति होते हुए भी उसमे कुछ न कुछ विशिष्टता लाकर उसे अन्य उत्पादों से अलग दर्शाने का प्रयास करती है ताकि उस उत्पाद की पृथक पहचान बनाई जा सके | इससे बाजार में प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलता है तथा प्रत्येक फर्म को अपने उत्पाद की विशिष्टताओं के कारण कुछ एकाधिकारी शक्ति प्राप्त हो जाती है | विक्रेताओं की संख्या अधिक होने के बावजूद प्रत्येक फर्म उत्पाद विभेद के कारण एकाधिकार का कुछ स्तर पाने में सफल हो जाती है |

‘उत्पाद विभेद का निहितार्थ यह है की किसी एक फर्म के उत्पाद को अन्य फर्मों के उत्पाद के क्रेता उत्पाद विभेद के आधार पर ही पृथक रूप से चिन्हित कर पाते है | इसी आधार पर वे अलग-अलग फर्मों के उत्पादों (ब्रांडो) की अलग-अलग कीमत भुगतान करने के लिए तैयार हो जाते है | यह उत्पादकों को सिमित मात्रा में एकाधिकारिक शक्ति प्रदान करता है जिससे वे बाजारी कीमत को प्रभावित करते है |

iii) प्रवेश एवं बाहर निकालने की स्वतंत्रता :  यह विशेषता बाजार में प्रतियोगिता को और कठोर बनाता है | नई फर्मो के निकट स्थानापन्न वस्तुओं के साथ बाजार में प्रवेश करने से प्रतियोगिता बढती है | बाजार में फर्मों के स्वतंत्र प्रवेश तथा बाहर निकलने की स्वतंत्रता के कारण दीर्घकाल में फर्म को सामान्य लाभ ही प्राप्त हो पाता है |

iv) बिक्री की लागतें : यह एकाधिकारिक प्रतियोगिता का विशिष्ट तत्व है | इस प्रकार के बाजार में, उत्पाद विभेद के कारण, प्रत्येक फर्म को बिक्री लागतों के रूप में अतिरिक्त व्यय करना पड़ता है | बिक्री बढ़ाने हेतु किये जाने वाले खर्चें, विज्ञापन से जुड़े खर्चे, विपणन स्टाफ का वेतन आदि बिक्री की लागतों का हिस्सा है | पूर्ण प्रतियोगिता वाले बाजार में उत्पादों की समरूपता तथा एकाधिकारी बाजार में शून्य प्रतियोगिता से बिक्री लागतें प्राय: नहीं होती |

v) पारस्परिक निर्भरता की अनूपस्थिति : बड़ी संख्या में फर्मो के आकर की भिन्नता होती है प्रत्येक फर्म की अपनी उत्पादन एवं विपणन निति होती है | कोई फर्म किसी अन्य फर्म से प्रभावित नहीं होती | सभी स्वतंत्र होती है |

vi) द्वि-आयामी प्रतियोगिता : एकाधिकार प्रतियोगिता के दो पहलु है अर्थात कीमत प्रतियोगिता – कीमत के आधार पर फर्मों के बिच प्रतियोगिता तथा गैर-कीमत प्रतियोगिता अर्थात ब्रांड मूल्य के आधार पर प्रतियोगिता तथा उत्पाद गुणवत्ता विज्ञापन |

11) फर्मों के बाजार में प्रवेश में बहूत कम बाधाओं के साथ अनेक फर्में विभेदीकृत वस्तु का उत्पादन करने वाला एक बाजार

a) पूर्ण प्रतियोगिता

b) एकाधिकार

c) एकाधिकारिक प्रतियोगिता

d) अल्पाधिकार

उत्तर – c

12) अल्पाधिकार क्या है? कुछ उदाहरणों से स्पष्ट कीजिये |

उत्तर – अल्पाधिकार एक ऐसा बाजार है जहाँ कुल उत्पादन कुछ ही फर्मों द्वारा किया जाता है | कुछ ही फर्मों जो समरूप या विभेदीकृत उत्पाद बेचती है, से युक्त बाजार ही अल्पाधिकार है | दुसरे शब्दों में, अल्पाधिकार बाजार सरंचना विशुद्ध एकाधिकार एवं एकाधिकारिक प्रतियोगिता के बिच की स्थिति है | जहाँ बाजार पर कुछ ही फर्मों का प्रभुत्व होता है तथा उत्पादन की मात्रा तथा कीमत पर उनका नियंत्रण होता है |

अल्पाधिकार के अंतर्गत फर्में या तो समरूप वस्तु उत्पादित करती है या विजातीय अथवा विभेदीकृत वस्तुएं उत्पादित करती है –  i) समरूप उत्पाद : एक ही जैसी वस्तु का उत्पादन करने वाली फर्मों से युक्त बाजार से विशुद्ध अल्पाधिकार कहा जाता है | ऐसा अल्पाधिकार बाजार एल्युमीनियम, इस्पात, तम्बा, जस्ता आदि के क्षेत्रों में पाया जाता है |

ii) विजातीय उत्पाद : विजातीय उत्पाद बेचने वाली फर्मों से युक्त बाजार को अपूर्ण या विभेदीकृत अल्पाधिकार कहा जाता है | इस प्रकार का अल्पाधिकार ऑटोमोबाइल, साबुन, डिटर्जेंट, टेलीवीजन, रेफ्रिजरेटरों का उत्पादन करने वाली फर्मों का बाजार होता है |

13) ऐसे तत्वों को चिन्हित करके समझाइए जो बाजार में अल्पाधिकार को बनाये रखते है |

उत्तर – अल्पाधिकार के बने रहने या उभरने के लिए कतिपय प्रमुख कारण उत्तरदायी है |

i) बड़े पैमाने पर पूंजी निवेश : अल्पाधिकार के अंतर्गत फर्मों की संख्या भले ही कम क्यों न हो लेकिन इनकी पूंजी की आवश्यकता काफी बड़ी होती है | इसलिए कोई भी नया निवेशक किसी ऐसे उद्योग में बड़े स्तर पर पूंजी निवेश करने के लिए तैयार नहीं होता, जहाँ उत्पादन की मात्रा में वृद्धि होने से कीमत में गिरावट सुनिश्चित हो | इतना ही नहीं, प्रवेश के लिए तैयार नई फर्म को पहले से स्थापित फर्मों के साथ कीमत-युद्ध छिड़ जाने की आशंका भी विद्यमान रहती है | विभेदीकृत उत्पाद उत्पादीत करने वाले अल्पाधिकार के बिच ऐसा होना स्वाभाविक रूप से होता है | इसलिए किसी नए उत्पाद का उत्पादन करना काफी कठिन होता है |

ii) कतिपय अपरिहार्य संसाधनो पर नियंत्रण : कुछ फर्मों के उत्पादन के लिए आवश्यक अपरिहार्य संसाधनो पर नियंत्रण होने से अन्यों के सापेक्ष लागत में अनेक लाभ प्राप्त हो सकते है | एसी फर्में अन्य की तुलना में अधिक लाभ पर उत्पादन कर सकती है |

iii) विभिन्न प्रतिबंध एवं पेटेंट : सार्वजानिक उपयोगिता क्षेत्रक में नई फर्मों का प्रवेश राज्य द्वारा प्रदत्त अनुमति प्रदान किये जाने से विनिमय होता है | प्रतिद्वन्दियों के अपवर्जन की यह निति छोटे पैमाने की अबचतों या सेवाओं के द्विरावृति (Duplication) के कारण हो सकती है | अल्पाधिकार के उभरने का एक अन्य कारण पेटेंट अधिकार है जिसे कतिपय वस्तुओं के मामलें में कुछ ही फर्में हासिल कर पाती है | अमेरिका एवं अन्य देशों में पेटेंट अधिकारों के कारण ही की महत्वपूर्ण औद्योगिक एकाधिकारी पनपे है |

iv) पैमाने की बचतें : अल्पाधिकार के उभरने का एक अन्य कारण फर्मों को बड़े पैमाने की बचतें प्राप्त होना है | कुछ उद्योगों में कुछ फर्में  उत्पाद की पूरी मांग को पूरा करती है | हो सकता है की मांग केवल बड़ी फर्मों द्वारा ही पूरी कर दी जाये | इससे छोटे फर्मों को बड़े पैमाने की बचतें प्राप्त नहीं होती है | ऐसे उद्योगों में जहाँ बड़े पैमाने पर यांत्रिकीकरण होता है, वहां बड़े पैमेने की बचतें भी विद्यमान होती है | ऐसे में कुछ फर्में उत्पादन में टिक पाती है | फर्में इतना बड़ा आकर ग्रहण कर लेती है की इनमे से कुछ ही सम्पूर्ण मांग को पूरा कर जाती है |

उदाहरण के तौर पर ऑटोमोबाइल, इस्पात उद्योग, पेट्रोलियम खोज, निकासी एवं परिशोधन उद्योग आदि | अल्पाधिकार स्थानीय बाजारों में भी पाया जाता है | छोटे-छोटे कस्बों में कुछ ही फर्में सम्पूर्ण मांग को पूरा करने में सक्षम हो सकती है | जैसे की पेट्रोल, बैंक, भवन निर्माण सामग्री के आपूर्तिकर्ता आदि | वहां बाजार छोटा होता है जिसे छोटी-फर्मों द्वारा भी संतुष्ट किया जा सकता है |

v) श्रेष्ठ उद्यमी : कुछ उद्योगों में कुछ श्रेष्ठ उद्यमी हो सकते है जिनकी लागतें अपने से कमजोर उद्यमियों की तुलना में कम हो | ऐसे उद्यमी अपने अधिकांश प्रतिद्वन्दियों को उद्योग से बाहर कर सकते है |

vi) विलय (Merger) : अनेक अल्पधिकारी फर्मों का सृजन दो या दो से अधिक स्वतंत्र फर्मों के विलय से हुआ है | दो या दो से अधिक फर्मों का आपस में मिल जाना विलय कहलाता है | फर्म की बाजारी शक्ति में वृद्धि करना, अधिक संसाधनो पर कब्जा करना, बड़े पैमाने की बचतें प्राप्त करना तथा बाजार का विस्तार करना ही विलय के उद्देश्य होते है |

vii) उद्योग में प्रवेश की कठिनाइयां : अल्पाधिकार के अस्तित्व में बने रहने का एक प्रमुख कारण है की इसमें किसी नई फर्म को प्रवेश करने में अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है | बड़े पैमाने पर पूंजी की आवश्यकता इनमे से एक है | व्यवसायी ऐसे किसी भी उद्यम में बड़े पैमाने पर निवेश नहीं करना चाहेगा जिसमे किसी नई फर्म, भले ही वह एक ही क्यों न हो, के प्रवेश से कीमत इतनी कम हो जाये की व्यवसाय करना भी लाभ का सौदा न रहे | नई फर्में इस बात से भी आशंकित हो सकती है की उनके प्रवेश करते ही पहले से विद्यमान सशक्त फर्मों द्वारा कीमत युद्ध प्रारंभ न कर दिया जाये | पहले से मजबूत स्थिति वाले ब्रांडो के सापेक्ष किसी नए ब्रांड के विपणन में आने वाली कठिनाईयों से घबराकर भी नए  स्मभावित उद्यमी पीछे हट जाते है |

14) अनेक क्रेताओं तथा कुछ प्रभावशाली विक्रेताओं से  युक्त बाजार है

 a) विशुद्ध प्रतियोगिता

b) एकाधिकार

c) एकाधिकारिक प्रतियोगिता

d) अल्पाधिकार

उत्तर – d

15) व्यापार संगुट से आप क्या समझते है ?

उत्तर – व्यापर संगुट को उत्पादन की मात्रा तथा कीमत निर्णय हेतु फर्मों के एक समूह के आपस में मिल जाने के रूप में परिभाषित किया जाता है | जो दशाएं अल्पधिकारी बाजार को ऊपर उठने में सहायक है वही दशाएं व्यापर संगुट के गठन के लिए उत्तरदायी है | व्यापार संगुट उन्ही बाजार में गठित हो पाता है जहाँ फर्मों की संख्या कम होती है तथा प्रत्येक फर्म का बाजार में हिस्सा महत्वपूर्ण होता है | संयुक्त राज्य अमेरिका में व्यापर संगुट अवैध है किन्तु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार संगुट बनने पर कोई प्रतिबंध नहीं है | पेट्रोलियम निर्यातक देशो का संगठन (OPEC) सर्वाधिक शक्तिशाली अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगुट है | ओपेक के सदस्य देश प्रत्येक के द्वारा उत्पादित की जा सकने वाली मात्रा के बारे में निर्णय करने के लिए समय-समय पर आपस में मिलते रहते है |

अल्पधिकारी फर्में अपनी बाजार ताकत को बढ़ाने के लिए व्यापार संगुट से जुडती है | व्यापार संगूट के सदस्य संयुक्त रूप से उत्पादन के स्तर तथा प्रत्येक सदस्य द्वारा उत्पादित की जा सकने वाली मात्रा का निर्धारण करने के लिए एक साथ मिलकर कार्य करते है | एक साथ मिलकर कार्य करने से ये सदस्य एकाधिकारी के रूप में व्यवहार करते है |

16) साधन कीमत निर्धारण से आप क्या समझते है? साधन बाजार क्या है?

उत्तर – वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन में उत्पत्ति के साधनों की आवश्यकता होती है | वस्तुओं एवं सेवाओं के बाजारों की भांति अर्थव्यवस्था में उत्पत्ति के साधनों के भी अपने बाजार होते है | उत्पत्ति के चार प्राथमिक साधन है – भूमि, श्रम, पूंजी एवं उद्यम | जब बाजार में इस इन साधनों से बनने वाले उत्पादों या सेवाओं की मांग बढती है तो इन उत्पादन साधनों की मांग में भी वृद्धि होती है और इन्ही के व्युत्पन्न इनकी कीमत में भी परिवर्तन होता है |  साधन बाजार ऐसे बाजार है जहा भूमि, श्रम तथा पूंजी जैसे उत्पत्ति के साधनों का क्रय-विक्रय किया जाता है

17) उधार देय योग्य कोष सिद्धांत को 50 शब्दों में समझाइए |

उत्तर – यह सिद्धांत उधार देने योग्य कोषों की मांग एवं आपूर्ति द्वारा उस ब्याज दर का निर्धारण करता है जिस पर लेनदेन किये जाते है | यह सिद्धांत मानकर चलता है की किसी समय बिंदु पर कुछ ऐसे लोग होंते जो अपनी चालू आय से कम खर्च कर रहे होंते (बचत करने वाले) तो दूसरी और ऐसे लोग होंगे जो अपनी वर्तमान आय से अधिक खर्च रहे होंगे | पहले वर्ग के लोगों को उधार योग्य कोषों का आपूर्तिकर्ता तथा दुसरे वर्ग के लोगो को उधार योग्य कोषों की मांग करने वाले वर्ग में रखा जा सकता है | ब्याज की दर उस बिंदु पर निर्धारित होती है जहाँ उधार योग्य कोषों की मांग एवं आपूर्ति आपस में बराबर होती है |

18) श्रम बाजार के तत्व कौन-से है ? श्रम की मांग किस प्रकार व्युत्पन्न मांग है ?

उत्तर – श्रम बाजारों का अर्थ समझने के लिए, यह समझने जरूरी है की श्रम बाजार में श्रम की मांग करने वाले तथा आपूर्ति करने वाले कौन है

फर्में एवं अन्य सेवा योजक वस्तुएं एवं सेवाओं का उत्पादन करने के लिए श्रम की मांग करते है | परिवार श्रम की आपूर्ति करते है और इसके बदले मजदूरी पाते है | श्रम बाजार एक ऐसा बाजार है जहाँ श्रमिक श्रम की आपूर्ति करते है तथा सेवायोजकों के द्वारा श्रम की मांग की जाती है | श्रम बाजार में प्रयुक्त किये जाने वाले माप है – बेरोजगारी दर, श्रम उत्पादकता, श्रम सघनता, श्रम सहभागिता दर, सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत रूप में कुल मजदूरी आय | मजदूरी से आशय श्रम की कीमत से है जो परिवारों को आय प्रदान करती है तथा फर्म के लिए लागत होती है |

19) अर्थव्यवस्था में श्रम संघ किस प्रकार मजदूरी की दरों एवं रोजगार के स्तर को प्रभावित करते है ?

उत्तर – श्रम संघ श्रमिकों के संघ है जो श्रमिकों की और से सेवायोजकों के साथ सोदेबजी करते है | इनके प्रमुख मुद्दे मजदूरी की दरें, श्रमिकों को काम पर रखने तथा काम से हटाने, विभिन्न प्रकार के कामगारों के कर्तव्य और दायित्व, काम के घंटे तथा काम की दशाएं, कामगारों एवं सेवायोजकों के बिच विवादों का निपटारा आदि होते है | श्रम संघो को हड़ताल की शक्ति के सहारे सेवायोजकों से सोदेबजी की शक्ति प्राप्त होती है | हड़ताल श्रमिकों द्वारा सामुहित रूप से काम बंद कर देने की स्थिति है | प्राय: हड़ताल तब तक चलती है जब तक श्रमिकों की मांग के अनुरूप कोई सर्वमान्य समझौता नहीं हो जाता |

आलोचकों का दृष्टिकोण है की यद्यपि काम और कामगारों के हितो की रक्षार्थ श्रमसंघो की भूमिका महत्वपूर्ण है तथापि आज की व्यवस्था में श्रम संघो से युक्त फर्में उन फर्मों से प्रतियोगिता नहीं कर पाती जहाँ, श्रम संघ नहीं होते, क्योंकि श्रम संघो के दबाव से फर्मों को कृत्रिम रूप से श्रमिकों को ऊँची मजदूरी देनी पड़ती है जिससे फर्मों की लागतों में वृद्धि हो जाती है |

20) आर्थिक लगान का अर्थ समझाइए |

उत्तर – सामान्य बोलचाल की भाषा में दूकान, मकान, वाहन, मशीन आदि जैसे आस्तियों के उपयोग के बदले किये जाने वाले संविदात्मक भुगतान के लिए ‘लगान’ शब्द का प्रयोग किया जाता है | अर्थशास्त्रियों ने परम्परागत रूप से इस शब्द का प्रयोग केवल भूमि के लिए किया है | जहाँ भूमि लगान का अर्थ भूमि की एक इकाई का उपयोग करने के बदले चुकाई गई कीमत से है वहीँ भूमि का मूल्य किसी समय बिंदु पर भूमि के एक खंड को खरीदने के लिए चुकाई गई कीमत से है |

21) सार्वजानिक वस्तुओं और निजी वस्तुओं में क्या अंतर है ?

उत्तर – सार्वजानिक वस्तुओं के दो प्रमुख अभिलक्षण है – गैर-अपवर्जनियता तथा गैर-प्रतिद्वंद्वीता | ये दोनों ही कारक उन्हें निजी वस्तुओं से पृथक बनाते है |

22) वाणीज्यवाद पर संक्षिप टिप्पणी कीजिये |

उत्तर – वाणिज्यवाद का सिद्धांत बताता है की देश को निर्योतों को बढ़ाना चाहिए और आयातों को हतोत्साहित करना चाहिए अधिकाधिक मात्रा में निर्यात करना तथा कम से कम मात्रा में आयात करना तथा विनिमय में अधिकाधिक सोना प्राप्त करना ही वाणिज्यवाद है |

23) विश्व व्यापार संगठन क्या है ?

उत्तर – विश्व व्यापर संगठन एकमात्र ऐसा वैश्विक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है जो विभिन्न देशो के बिच व्यापर के नियमो को बनाकर सारे विश्व में वस्तुओं और सेवाओं के मुक्त प्रवाह को सुविधाजनक बनाता है |इसकी स्थापना 1 जनवरी 1955 को की गयी थी | एक वैश्विक संगठन के रूप में इसके 164 सदस्य है तथा 22 देशो को पर्यवेक्षक का दर्जा प्राप्त है |

24) प्रशुल्क एवं व्यापर पर सामान्य समझौता (GATT) क्या है ?

उत्तर – प्रशुल्क एवं व्यापर पर सामान्य समझौता 1947 में जेनेवा में हुआ था | भारत सहित विश्व के 23 देश इस संगठन (GATT) के संस्थापक सदस्य थे | गैट कोई अधिकृत संगठन नहीं था जो अपने निर्णयों को लागू करा सके | यह इसमें शामिल देशो के बिच एक समझौता था जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापर में शामिल थे | गैट का मुख्या उद्देश्य विश्व व्यापर से प्रशुल्कों को कम करना तथा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार की बाधाओं तथा भेदभाव में कमी लाकर व्यापार में वृद्धि करना था |

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